लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ठाणे स्थित प्रादेशिक मनो चिकित्सालय अपनी मानवीय सेवाओं के कारण एक अनूठी पहचान बना चुका है। यहां ऐसे बच्चे, युवा और बुजुर्ग लाए जाते हैं, जो किसी कारणवश अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं और भटकते हुए यहां तक पहुंचते हैं। अस्पताल की टीम न केवल उनका इलाज करती है, बल्कि उनकी याददाश्त बहाल कर उन्हें उनके परिजनों से मिलाने का सराहनीय कार्य भी करती है।
इसी क्रम में हाल ही में अस्पताल ने एक और उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। अस्पताल प्रशासन ने चार महीने से लापता बिहार के एक युवक को उसके परिवार से मिलवाया। यह संभव हुआ चिकित्सकीय उपचार, सोशल सर्विस विभाग की मेहनत और पुलिस के बेहतर समन्वय से।
जानकारी के अनुसार, 7 नवंबर 2025 को युवक मरीन ड्राइव इलाके में मानसिक रूप से अस्वस्थ अवस्था में मिला था। पुलिस ने उसे इलाज के लिए ठाणे के प्रादेशिक मनो चिकित्सालय में भर्ती कराया। प्रारंभिक अवस्था में युवक पूरी तरह शांत और असहयोगी था। उसका उपचार अधीक्षक डॉ. नेताजी मुलिक की देखरेख में शुरू किया गया।
धीरे-धीरे काउंसलिंग और इलाज के बाद युवक ने अपना नाम सुरेंद्र शर्मा (परिवर्तित नाम) और गृह जिला छपरा बताया। इसके बाद सोशल सर्विस विभाग ने सक्रियता दिखाते हुए बिहार पुलिस से संपर्क किया और दाउदपुर थाना के इंस्पेक्टर कुंदन कुमार के साथ समन्वय स्थापित किया।
जांच के दौरान पता चला कि युवक का परिवार अब दिल्ली में रह रहा है। पुलिस ने युवक की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की, जिसके आधार पर उसके भाई रितेश तक पहुंच बनाई गई। 13 जनवरी 2026 को वीडियो कॉल के माध्यम से युवक की पहचान की पुष्टि हुई।
हालांकि, डॉक्टरों ने युवक के पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद ही उसे परिवार को सौंपने का निर्णय लिया। लगातार इलाज और मनोवैज्ञानिक सहायता के बाद उसकी स्थिति में सुधार आया। इसके बाद अस्पताल में ही भाई रितेश और युवक का भावुक मिलन हुआ।
रितेश ने अस्पताल प्रशासन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके भाई के लापता होने के बाद परिवार पूरी तरह टूट चुका था, लेकिन ठाणे मनो चिकित्सालय ने उन्हें फिर से मिलाकर नई उम्मीद दी है।
इस पूरे प्रयास में डिप्टी सुपरिटेंडेंट डॉ. प्राची चिवटे, सीनियर साइकियाट्रिस्ट डॉ. आशीष पाठक, डॉ. मनोज भिसे सहित नर्सिंग और सोशल सर्विस स्टाफ की अहम भूमिका रही।
अस्पताल के अधीक्षक डॉ. नेताजी मुलिक ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य उपचार में चिकित्सा के साथ पुनर्वास भी अत्यंत आवश्यक है। मरीजों को उनके परिवार से मिलाना उनके कार्य का सबसे संतोषजनक पहलू है।