नेपाल में चुनावी सर्वे प्रकाशन पर विवाद, ऑनलाइन पोर्टलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

गोपनीयता अधिकार के हनन की बात

नेपाल में चुनावी सर्वे प्रकाशन पर विवाद, ऑनलाइन पोर्टलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

नेपाल की प्रतिनिधि सभा चुनाव से पहले कथित आचार संहिता उल्लंघन कर जनमत सर्वे जैसे चुनावी विश्लेषण प्रकाशित करने पर कई ऑनलाइन मीडिया पोर्टलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर।

नेपाल में चुनावी सर्वे प्रकाशन पर विवाद ऑनलाइन पोर्टलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

प्रतिनिधि सभा चुनाव से पहले जनमत सर्वे प्रकाशित करने को लेकर कानूनी विवाद गहराया। | LNI.ONE

आकांशा खटाना 
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया 

नेपाल की संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के चुनाव से पहले निर्वाचन आचार संहिता के विपरीत जनमत सर्वेक्षण की शैली में चुनावी विश्लेषण प्रकाशित करने के आरोप में कई ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की गई है। अधिवक्ता आभास रेग्मी, आयुष बडाल और आकाश ढकाल द्वारा संयुक्त रूप से दायर की गयी इस याचिका में प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद् कार्यालय, संचार तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, निर्वाचन आयोग, प्रेस काउंसिल नेपाल सहित जनमत सर्वेक्षण प्रकाशित करने वाले मीडिया के मालिकों और संपादकों को प्रतिवादी बनाया गया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ मीडिया संस्थानों ने चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से विभिन्न जिलों के उम्मीदवारों की हार-जीत का पूर्वानुमान लगाने वाले समाचार प्रकाशित किए, जो निर्वाचन आचार संहिता की धारा 4 और 25 के विपरीत है। याचिका में उल्लेख किया गया है कि आचार संहिता के अनुसार उम्मीदवारों के नामांकन दर्ज होने की तिथि से लेकर मतदान सम्पन्न होने तक किसी भी उम्मीदवार या राजनीतिक दल के मत परिणाम संबंधी जनमत सर्वेक्षण करना या उसके परिणाम की घोषणा करना निषिद्ध है।

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि विश्लेषण के आवरण में मतदाताओं की व्यक्तिगत धारणा सार्वजनिक कर संविधान की धारा 28 द्वारा प्रदत्त गोपनीयता के अधिकार तथा गोपनीय मतदान की अवधारणा का उल्लंघन किया गया है। इससे मतदाताओं की मानसिकता प्रभावित होने और चुनाव की निष्पक्षता पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि निर्वाचन आयोग और प्रेस काउंसिल नेपाल ने ऐसे कार्यों को रोकने में प्रभावी भूमिका नहीं निभाई। इसलिए अदालत से अनुरोध किया गया है कि इस प्रकार की समाचार सामग्री के प्रकाशन/प्रसारण पर रोक लगाने के लिए परमादेश जारी किया जाए।

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