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BRICS पर चिदंबरम के सवाल से गरमाई सियासत, BJP ने घेरा

BRICS समिट को लेकर कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के सवालों पर सियासत गरमा गई है। चिदंबरम ने हालिया BRICS सम्मेलनों से भारत को हुए ठोस फायदे पर सवाल उठाए, जिसके बाद बीजेपी ने उन पर पलटवार किया।

By : Local News of India
BRICS पर चिदंबरम के सवाल से गरमाई सियासत, BJP ने घेरा

BRICS Summit पर चिदंबरम के सवाल से गरमाई सियासत!

लोकल न्यूज ऑफ इंडिया

अदिति जैन

नई दिल्ली में होने वाले BRICS Summit 2026 से पहले देश की राजनीति में इस अंतरराष्ट्रीय मंच को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने हाल के BRICS सम्मेलनों से भारत को होने वाले ठोस फायदे पर सवाल उठाए हैं। चिदंबरम का कहना है कि पिछले दो-तीन BRICS सम्मेलनों से उन्हें भारत के लिए कोई स्पष्ट और ठोस नतीजा नजर नहीं आया। उनके इस बयान के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधा और राजनीतिक बहस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘नाराज फूफा’ वाले तंज से जोड़ दिया।

चिदंबरम ने BRICS को लेकर क्या सवाल उठाया?

दिल्ली में BRICS Summit की तैयारियों के बीच पी. चिदंबरम ने भारत की बहुपक्षीय कूटनीति पर सवाल उठाते हुए पूछा कि BRICS, SCO, G20 और QUAD जैसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय समूहों में भारत की भागीदारी से देश को वास्तविक तौर पर क्या फायदा मिल रहा है।

चिदंबरम ने कहा कि वह पिछले दो-तीन BRICS सम्मेलनों में भारत के लिए कोई ठोस लाभ या ठोस परिणाम नहीं देख पाए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि पहले BRICS सम्मेलनों से कुछ ठोस फायदे हासिल हुए थे।

चिदंबरम का सवाल ऐसे समय आया है जब भारत 2026 BRICS Summit की मेजबानी करने जा रहा है। दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाले सम्मेलन को लेकर सुरक्षा से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर तक बड़े स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं।

BRICS में भारत की भूमिका क्यों अहम है?

BRICS अब सिर्फ पांच देशों का पुराना समूह नहीं रह गया है। इसके विस्तार के बाद यह 11 सदस्य देशों वाला बड़ा बहुपक्षीय मंच बन चुका है। भारत के लिए BRICS इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए वह ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका मजबूत करने, व्यापार और निवेश बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल टेक्नोलॉजी और विकास से जुड़े मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

2026 में भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और नई दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन भारत के लिए अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को सामने रखने का बड़ा अवसर माना जा रहा है। इस बार चर्चा के केंद्र में व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, कृषि और टिकाऊ विकास जैसे मुद्दे रहने की उम्मीद है।

भारत BRICS के जरिए वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने की कोशिश भी करता रहा है। ऐसे में चिदंबरम का यह सवाल कि इन बैठकों से भारत को ‘तुरंत और ठोस’ क्या हासिल हुआ, राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है।

दिल्ली में BRICS Summit की जोरदार तैयारी

BRICS Summit के लिए राजधानी दिल्ली में बड़े स्तर पर सुरक्षा और प्रशासनिक तैयारियां चल रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, सम्मेलन के दौरान करीब 25 हजार सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जा रही है। 100 से ज्यादा NSG कमांडो और एंटी-ड्रोन सिस्टम भी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा होंगे।

इसके अलावा 11 होटलों और करीब 35 सुरक्षित रूटों को लेकर भी सुरक्षा व्यवस्था तैयार की गई है। सम्मेलन में BRICS के सदस्य और पार्टनर देशों के शीर्ष नेता और वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल होने वाले हैं।

यानी एक तरफ भारत इस सम्मेलन को अपनी वैश्विक कूटनीतिक ताकत और नेतृत्व क्षमता दिखाने के अवसर के तौर पर देख रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसकी उपयोगिता और भारत को मिलने वाले प्रत्यक्ष परिणामों पर सवाल उठा रहा है।

‘नाराज फूफा’ पर भी छिड़ी सियासी बहस

इस पूरे विवाद में ‘नाराज फूफा’ वाला बयान भी चर्चा में आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के अपने भाषणों में सरकार के कामों पर लगातार सवाल उठाने वाले आलोचकों पर तंज कसते हुए ‘नाराज फूफा’ शब्द का इस्तेमाल किया था।

बीजेपी ने इसके बाद सोशल मीडिया पर भी इसी थीम को लेकर एक व्यंग्यात्मक रील जारी की। बीजेपी का आरोप है कि सरकार के विकास कार्यों पर बिना सकारात्मक सुझाव के लगातार सवाल उठाने वाले लोग हर काम में कमी निकालते हैं।

यही शब्द अब चिदंबरम और विपक्ष पर बीजेपी के राजनीतिक हमले का हिस्सा बन गया है।

चिदंबरम का पलटवार भी सामने आया

दिलचस्प बात यह है कि चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के ‘नाराज फूफा’ वाले तंज को भी नजरअंदाज नहीं किया। उन्होंने प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ जैसे शब्दों पर प्रतिक्रिया देते हुए इन्हें अर्थहीन बताया।

चिदंबरम ने कहा कि प्रधानमंत्री नए-नए स्लोगन और शब्द गढ़ते हैं और सोशल मीडिया पर लोग इन पर मीम बनाते हैं। उन्होंने दावा किया कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द से जुड़े उनके पोस्ट को भी सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लाइक्स मिले।

चिदंबरम ने यह भी कहा कि उन्हें बताया गया है कि Gen Z के बीच ‘नाराज फूफा’ और ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर काफी मीम बनाए जा रहे हैं।

असली सवाल—BRICS से भारत को कितना फायदा?

पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि BRICS जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों से भारत को किस तरह के फायदे हासिल होते हैं और उन फायदों को किस पैमाने पर मापा जाए।

भारत के लिए BRICS केवल किसी एक सम्मेलन या एक समझौते का मंच नहीं है। यह व्यापार, निवेश, विकास वित्त, ऊर्जा, डिजिटल सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे कई मुद्दों पर बातचीत का प्लेटफॉर्म है।

दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि किसी अंतरराष्ट्रीय समूह की सदस्यता तभी प्रभावी मानी जानी चाहिए जब उससे भारत के लिए स्पष्ट आर्थिक, रणनीतिक या कूटनीतिक परिणाम सामने आएं।

यही वह बिंदु है जिस पर चिदंबरम ने सवाल उठाया है। उनका कहना है कि पिछले कुछ सम्मेलनों में भारत को मिलने वाला ठोस लाभ उन्हें दिखाई नहीं दिया।

भारत के सामने बड़ा कूटनीतिक अवसर

2026 का BRICS Summit ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। BRICS के विस्तार के साथ संगठन के भीतर अलग-अलग देशों के हित भी सामने आ रहे हैं। पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार व्यवस्था जैसे मुद्दे इस बार महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।

भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अलग-अलग देशों के हितों के बीच संतुलन बनाते हुए BRICS को व्यावहारिक सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाए।

भारत इस सम्मेलन के जरिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप, MSME, निवेश और सीमा-पार भुगतान जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दे रहा है। इससे सरकार की कोशिश BRICS को केवल राजनीतिक चर्चा के मंच से आगे ले जाकर आर्थिक और तकनीकी सहयोग का माध्यम बनाने की है।

सियासत बनाम कूटनीति

BRICS को लेकर चिदंबरम का सवाल ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार इसे भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर के रूप में पेश कर रही है। इसलिए यह विवाद सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की उपयोगिता तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की विदेश नीति और उसके परिणामों को लेकर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।

एक तरफ बीजेपी का जोर भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, विकास और कूटनीतिक प्रभाव पर है। दूसरी तरफ कांग्रेस यह पूछ रही है कि इन अंतरराष्ट्रीय मंचों से आम भारतीय और भारतीय अर्थव्यवस्था को आखिर कितने ठोस फायदे मिल रहे हैं।

अब नजर इस बात पर होगी कि 12-13 सितंबर को दिल्ली में होने वाले BRICS Summit में भारत किन मुद्दों को आगे बढ़ाता है और सम्मेलन के बाद कौन से ठोस फैसले या पहल सामने आती हैं।

फिलहाल BRICS Summit से पहले शुरू हुई यह सियासी बहस साफ संकेत दे रही है कि इस बार दिल्ली में होने वाला सम्मेलन सिर्फ विदेश नीति के लिहाज से ही नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है।

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