लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' और विजय की 'जन नायगन' को लेकर हालिया घटनाक्रम के बाद एक बार फिर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) चर्चा के केंद्र में है। जहां 'सतलुज' को लंबे समय से प्रमाणन और प्रदर्शन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, वहीं 'जन नायगन' को आखिरकार सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट मिल गया।
भारत में किसी भी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले उसे CBFC से प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य होता है। निर्माता फिल्म को बोर्ड के पास जमा करते हैं, जिसके बाद एग्जामिनिंग कमेटी फिल्म की समीक्षा करती है। यदि किसी दृश्य, संवाद या विषयवस्तु पर आपत्ति होती है तो संशोधन या कट का सुझाव दिया जा सकता है। विवाद की स्थिति में मामला रिवाइजिंग कमेटी तक भी जा सकता है।
CBFC मुख्य रूप से U, UA, A और S जैसी श्रेणियों में फिल्म को प्रमाणित करता है। फिल्म की भाषा, हिंसा, संवेदनशील विषय, यौन सामग्री और सामाजिक प्रभाव जैसे पहलुओं के आधार पर सर्टिफिकेट तय किया जाता है। हाल के मामलों ने एक बार फिर फिल्म प्रमाणन प्रक्रिया की पारदर्शिता और समयबद्धता पर बहस तेज कर दी है।