गुरप्रीत कालरा
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने OPEC और OPEC+ से बाहर निकलने का ऐलान कर वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा भूचाल ला दिया है। यह फैसला 1 मई 2026 से प्रभावी होगा और इसे तेल उत्पादक देशों के सबसे प्रभावशाली गठबंधन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
यूएई OPEC का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक माना जाता है। उसका बाहर निकलना सिर्फ एक सदस्य का जाना नहीं, बल्कि संगठन की सामूहिक ताकत और बाजार पर नियंत्रण क्षमता पर सीधा असर है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे OPEC की कीमत नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।
यूएई ने साफ कहा है कि वह अब अपनी “राष्ट्रीय प्राथमिकताओं” और स्वतंत्र ऊर्जा रणनीति के तहत काम करना चाहता है। उसका लक्ष्य 2027 तक उत्पादन क्षमता को 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाना है, जबकि OPEC कोटा व्यवस्था उसकी इस महत्वाकांक्षा में बाधा बन रही थी।
इस फैसले के पीछे सिर्फ आर्थिक नहीं, राजनीतिक कारण भी बताए जा रहे हैं। ईरान युद्ध, होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट और सऊदी अरब के साथ बढ़ती रणनीतिक दूरी ने यूएई को स्वतंत्र रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह OPEC के अंत की शुरुआत है? विशेषज्ञों का कहना है कि तुरंत ऐसा नहीं होगा, लेकिन यह जरूर है कि OPEC की “एकजुटता” को गंभीर चोट पहुंची है। अगर दूसरे उत्पादक देश भी कोटा व्यवस्था से असंतुष्ट होकर अलग रास्ता चुनते हैं, तो OPEC की पकड़ तेजी से ढीली पड़ सकती है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए इसका असर मिश्रित हो सकता है। अगर यूएई उत्पादन बढ़ाता है तो लंबे समय में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिल सकती है। हालांकि मौजूदा पश्चिम एशिया तनाव के कारण तुरंत राहत की उम्मीद कम है।
सऊदी अरब के नेतृत्व वाले OPEC के लिए यह सिर्फ आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की भी लड़ाई है। यूएई का बाहर जाना यह संकेत देता है कि तेल राजनीति अब पुराने नियमों पर नहीं चलेगी।
यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं कि UAE ने OPEC छोड़ा, बल्कि यह भी है कि क्या दुनिया का सबसे ताकतवर तेल क्लब अब बिखरने लगा है।