
प्रिया बिष्ट
लोकल न्यूज ऑफ इंडिया
दिल्ली .अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ट्रस्ट के मंच पर जब सम्मान समारोह चल रहा था, तब चारों ओर कैमरों की रोशनी, फूलों की महक और भाषणों की औपचारिकता गूँज रही थी। मंच पर मंत्रीजी अपने शब्दों के शिल्प से समाज को ‘संस्कार’ और ‘एकता’ का उपदेश दे रहे थे — लेकिन उसी वक्त मंच के एक कोने में एक दृश्य ऐसा घटा, जिसने बिना शब्दों के वह सब कह दिया जो किसी भाषण में नहीं कहा जा सकता।
राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता प्रदीप सक्सेना की वृद्ध माताजी जब सम्मान ग्रहण कर मंच से उतर रही थीं, तो सामने पड़ी सीढ़ियों को देखकर थोड़ी झिझक गईं। तभी सभा में मौजूद डॉ. मोहम्मद अमीन — भारत निर्वाचन आयोग के पूर्व निदेशक प्रोटोकॉल — झट से आगे बढ़े। उन्होंने न कोई औपचारिकता की, न कोई दिखावा किया। बस सहजता से माताजी का हाथ थाम लिया और उन्हें मंच से धीरे-धीरे उतार दिया।
यह दृश्य किसी कैमरे की रचना नहीं था, यह उस संवेदना की सजीव तस्वीर थी जो आज के समाज में दुर्लभ हो चुकी है। मंच पर जो संस्कार बोले जा रहे थे, वे शब्द बनकर गूंजे; लेकिन जो संस्कार मोहम्मद अमीन ने बोए, वे कर्म बनकर अमर हो गए।

कैमरामैन ने उस पल को कैद किया, लेकिन दर्शकों ने उसे दिल में उतार लिया। माताजी के चेहरे पर संतोष और आशीर्वाद का तेज था — उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “खुश रहो बेटा।” यह आशीर्वाद सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं मिला, बल्कि उस विचार को मिला जो भारत को ‘भारत’ बनाता है — वह विचार जिसमें धर्म नहीं, मानवता बोलती है।

मंच पर बैठे लोग तालियाँ बजा रहे थे, पर असली ताली उस क्षण के लिए थी जब इंसानियत ने जात-पात, धर्म और ओहदे की दीवारें तोड़ दीं। मंत्रीजी का भाषण खत्म हुआ तो शब्द हवा में घुल गए, लेकिन डॉ. मोहम्मद अमीन का वह संस्कार — एक मां का हाथ थामने का संस्कार — सबके दिलों में अंकुर बनकर बस गया।उस दिन किसी ने ‘संविधान’ की नहीं, ‘संवेदना’ की रक्षा की थी।और यह भारत की सबसे सुंदर तस्वीर थी — जहाँ एक मुसलमान अफसर एक हिन्दू मां का हाथ थामकर उसे सुरक्षित उतारता है, और दोनों की मुस्कान मिलकर देश की आत्मा को नया जीवन देती है।