लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण सूची में बदलाव को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा संशोधित सूची जारी किए जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि आखिर कौन-कौन सी मुस्लिम जातियां इस सूची में बची रह गईं।
सरकारी और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, संशोधित OBC सूची में कुछ पारंपरिक मुस्लिम समुदायों और पेशेवर उप-समूहों को शामिल रखा गया है, जबकि पिछली सरकार के समय जो कई उप-जातियां जोड़ी गई थीं, उन्हें हटाया गया है। यह कदम कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के बाद उठाया गया है, जिसमें 2010 के बाद जारी कई OBC प्रमाणपत्रों को अवैध माना गया था।
रिपोर्ट्स में जिन मुस्लिम उप-समूहों का नाम अलग-अलग श्रेणियों में बचा हुआ बताया गया है, उनमें आम तौर पर ये पारंपरिक पेशागत समुदाय शामिल माने जाते हैं (राज्य की पुनर्गठित सूची के आधार पर):
- पाथर मुस्लिम
- नापित (हज्जाम/नाई समुदाय के मुस्लिम वर्ग)
- कसाई (मांस व्यवसाय से जुड़े वर्ग)
- टांती (बुनकरी से जुड़े समूहों का हिस्सा)
- दनुक/धुनिया जैसे पारंपरिक कामकाजी समूह
- खांडैत/कंधायत से जुड़े उप-समूह (कुछ क्षेत्रों में मिश्रित वर्गीकरण)
- तुरहा जैसे छोटे पेशागत समुदाय
- देवांगा (बुनकर समुदाय से जुड़ा वर्ग)
- कापाली
- कुरमी (कुछ मामलों में धार्मिक रूप से मिश्रित वर्ग)
- पहाड़िया मुस्लिम
- कुछ अन्य छोटे क्षेत्रीय उप-समूह
सरकार का दावा है कि यह सूची 2010 से पहले के मानकों और कोर्ट के निर्देशों के आधार पर तैयार की गई है, ताकि आरक्षण व्यवस्था को कानूनी रूप से मजबूत किया जा सके।
वहीं विपक्ष का आरोप है कि यह पूरी कवायद राजनीतिक है और इससे कई समुदायों को आरक्षण लाभ से बाहर किया जा रहा है। उनका कहना है कि “धर्म आधारित छंटनी” की जा रही है, जबकि सरकार इसे केवल कानूनी सुधार और पुनर्गठन बता रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला केवल जाति सूची का नहीं बल्कि आरक्षण नीति, न्यायालय के आदेश और राजनीतिक संतुलन का भी है, जिसके कारण यह विवाद और गहरा सकता है।