लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
बीजिंग: चीन में 1 जुलाई से नया 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ' लागू हो गया है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में लाए गए इस कानून का उद्देश्य सरकार के अनुसार राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और सभी जातीय समुदायों के बीच सामंजस्य को मजबूत करना है। यह कानून शिक्षा, संस्कृति, भाषा और सामाजिक नीतियों में "राष्ट्रीय एकता" को बढ़ावा देने पर जोर देता है।
हालांकि, इस कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। मानवाधिकार संगठनों और कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून तिब्बती, उइगर और अन्य गैर-हान समुदायों की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को कमजोर कर सकता है। आलोचकों का आरोप है कि कानून में "जातीय एकता को नुकसान पहुंचाने" जैसी व्यापक परिभाषाएं दी गई हैं, जिनका इस्तेमाल अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।
चीन सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि कानून का उद्देश्य सभी जातीय समूहों के समान विकास, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है। वहीं कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने कानून के संभावित प्रभावों पर चिंता जताते हुए कहा है कि इसके लागू होने के बाद अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर नजर रखी जाएगी।