आकांशा खटाना
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
नई दिल्ली, 24 फरवरी 2026 – आज की युवा पीढ़ी जिस संवेदनशीलता से विभाजन की त्रासदी को समझ रही है, वह अद्भुत है। विशेष रूप से नाट्य मंचन 'लाहौर की गलियां' ने उस दौर की वेदना को जीवंत कर दिया। सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से इतिहास के उस काले अध्याय को फिर से जीवित कर दिया।

यह बात प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय (कुलपति, बाबा साहेब अंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी, कलकत्ता विश्वविद्यालय) ने मंगलवार को अदिति महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में "भारत विभाजन की साहित्यिक अभिव्यक्ति" विषय पर शुरू हुई तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए कही। श्री मनोज कुमार (राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय साहित्य परिषद) ने विशिष्ट अतिथि के रूप में शिरकत की। यह संगोष्ठी भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) द्वारा वित्तपोषित है। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत विभाजन की ऐतिहासिक त्रासदी को साहित्य के माध्यम से समझना और विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के बीच गंभीर चिंतन को बढ़ावा देना है।
द्वितीय सत्र में विभाजन की त्रासदी पर आधारित नाट्य मंचन "लाहौर की गलियां" प्रस्तुत किया गया। यह नाटक लाहौर की गलियों से प्रारंभ होकर विभाजन के दौरान बिछड़े परिवारों, विस्थापन, सांप्रदायिकता और उस समय की वेदना का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के सहयोग से प्रस्तुत इस नाटक में कलाकारों ने बंटवारे के दर्द और इंसानियत के संघर्ष को बेहद प्रभावशाली ढंग से दर्शाया। मुख्य अतिथि प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने कलाकारों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि इस नाटक ने विभाजन की त्रासदी को सजीव कर दिया। प्रोफेसर सोमा बंद्योपाध्याय ने आगे लाहौर की भोला पाटे गली का वर्णन करते हुए विभाजन के समय पंजाब और बंगाल के विभाजन की मार्मिक घटनाओं पर भी अपने विचार प्रस्तुत किए।

महाविद्यालय की प्राचार्या एवं संयोजिका प्रो. नीलम राठी ने अपने संबोधन में कहा, "यह संगोष्ठी केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं है, बल्कि इतिहास के उस अध्याय को समझने का माध्यम है जिसने करोड़ों लोगों को प्रभावित किया। विभाजन सिर्फ भूगोल का बंटवारा नहीं था, यह महिलाओं के सपनों का बंटवारा था, जहाँ उन्होंने अपने बलिदान से एक नई परिभाषा गढ़ी। आज की छात्राओं ने इस विषय को गहराई से समझा है।"
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 10 बजे महाविद्यालय के सभागार में मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। महाविद्यालय की प्राचार्या एवं संगोष्ठी की संयोजिका प्रो. नीलम राठी ने मुख्य अतिथि प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय एवं विशिष्ट अतिथि मनोज कुमार का देवी प्रतिमा एवं शाल ओढ़ाकर भव्य स्वागत किया।

संगोष्ठी के प्रथम दिवस का प्रथम सत्र महाविद्यालय के रीडिंग हॉल में शोध पत्र प्रस्तुति के रूप में हुआ। इस सत्र में देशभर के प्रतिष्ठित महाविद्यालयों से आई 14 छात्राओं ने भारत-पाकिस्तान विभाजन पर केन्द्रित अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। लेडी श्रीराम कॉलेज, खालसा कॉलेज सहित विभिन्न महाविद्यालयों की छात्राओं ने इस सत्र में भाग लिया।
प्रथम शोध पत्र शहजाद (लेडी श्रीराम कॉलेज) ने प्रस्तुत किया। तत्पश्चात आल्या ने “नीले पंखों वाली लड़कियाँ” कहानी संग्रह पर आधारित अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने बेवफ़ाइयाँ, तीन तलाक, हलाल जैसे सामाजिक मुद्दों पर गहन चर्चा की। इसके बाद धरती (लेडी श्रीराम कॉलेज) ने “55 खंभे लाल दीवारें” उपन्यास पर आधारित शोध पत्र प्रस्तुत कर भारतीय महिलाओं की मुश्किलों को उजागर किया। मानसी सिंह (श्री गुरु नानक देव खालसा महाविद्यालय) ने “भारत विभाजन में साहित्य व तमस उपन्यास” विषय पर अपना पेपर प्रस्तुत करते हुए बताया कि किस प्रकार हिंदी साहित्यकारों ने भारत विभाजन को साहित्य में उजागर किया है।

इन शोध पत्रों में विशेष रूप से विभाजन के दौरान महिलाओं के संघर्ष को रेखांकित किया गया। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि यह विभाजन केवल एक देश का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह महिलाओं के सपनों और उनकी अस्मिता का बंटवारा था, जहाँ उन्होंने अपने बलिदान से एक नई परिभाषा गढ़ी।
कार्यक्रम की शुरुआत में वरिष्ठ साहित्यकार मधु लोमेश ने जेन Z (Gen Z) को संबोधित करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी को विभाजन की त्रासदी को समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने नाटक "लाहौर की गलियां" का सार प्रस्तुत करते हुए बताया कि किस प्रकार इस नाटक के माध्यम से विभाजन की वास्तविकता को उजागर किया गया।
कार्यक्रम के अंत में महाविद्यालय की सांस्कृतिक समिति की छात्राओं ने आभार प्रकट किया। संगोष्ठी के दूसरे दिन भी शोध पत्र प्रस्तुति एवं विभाजन पर केन्द्रित अन्य सत्र आयोजित किए जाएंगे।