लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
1978 के कुख्यात बिल्ला-रांगा हत्याकांड से प्रेरित वेब सीरीज ‘राख’ दर्शकों को एक बार फिर उस दौर की भयावह यादों में ले जाती है। आठ एपिसोड की यह क्राइम थ्रिलर वास्तविक घटना को काल्पनिक नामों के साथ पेश करती है, लेकिन इसकी कहानी और माहौल मूल घटना से काफी हद तक मेल खाते हैं।
सीरीज की कहानी दो किशोर भाई-बहनों सुमन और साहिल की निर्मम हत्या के इर्द-गिर्द घूमती है। हालांकि वास्तविक पात्रों के नामों की जगह काल्पनिक नाम इस्तेमाल किए गए हैं, लेकिन दर्शक आसानी से इसे चर्चित गीता और संजय चोपड़ा केस से जोड़ सकते हैं।
अली फज़ल ने जांच अधिकारी जयप्रकाश जाटव के किरदार में प्रभावशाली अभिनय किया है। एक युवा पुलिस अधिकारी के रूप में उनका संघर्ष, सिस्टम से टकराव और न्याय दिलाने की जिद कहानी को मजबूती देती है। वहीं आमिर बशीर शोकाकुल पिता के रूप में भावनात्मक असर छोड़ते हैं, जबकि सोनाली बेंद्रे का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर नजर आता है।
सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष दो अपराधियों—बाबू और राज्जो—की मानसिकता और उनके जटिल रिश्ते का चित्रण है। लेखकों ने बाबू के हिंसक और विकृत व्यक्तित्व को बिना किसी सहानुभूति या बहाने के सामने रखा है, जो कहानी को और भी बेचैन करने वाला बनाता है।
राकेश बेदी का किरदार भी प्रभावित करता है। एक सेवानिवृत्त अधिकारी के रूप में उनका अभिनय सामाजिक और वर्गीय भेदभाव के मुद्दों को उभारता है। इसके अलावा, 70 के दशक के दिल्ली के सामाजिक माहौल और हाशिए पर जी रहे लोगों की जिंदगी को भी सीरीज में संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है।
हालांकि ‘राख’ सिर्फ क्राइम थ्रिलर नहीं बनना चाहती, बल्कि सामाजिक टिप्पणी और पुलिस प्रक्रिया को भी साथ लेकर चलती है। लेकिन कई जगह कहानी अनावश्यक फ्लैशबैक, अत्यधिक गाली-गलौज और हिंसा के कारण कमजोर पड़ती है। यही सवाल अंत तक बना रहता है कि क्या इतनी अधिक क्रूरता दिखाना कहानी की जरूरत थी या सिर्फ दर्शकों को झकझोरने का प्रयास।
कुल मिलाकर, ‘राख’ एक प्रभावशाली लेकिन असहज करने वाली क्राइम ड्रामा सीरीज है, जिसे अली फज़ल और सहायक कलाकारों के मजबूत अभिनय ने देखने लायक बनाया है।