लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में शुक्रवार को लगातार पांचवें दिन सुनवाई हुई। इस दौरान हिंदू पक्ष ने कोर्ट के समक्ष ऐतिहासिक, शिल्पकला और प्राचीन ग्रंथों के आधार पर विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए।
हिंदू पक्षकारों ने दावा किया कि भोजशाला कोई साधारण संरचना नहीं, बल्कि मां सरस्वती को समर्पित एक मंदिर और संस्कृत शिक्षण केंद्र था। उन्होंने अपने पक्ष में प्राचीन ग्रंथों, ब्रिटिशकालीन गजेटियर और राजा भोज द्वारा रचित ग्रंथों का हवाला दिया।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए मामले की सुनवाई 28 अप्रैल तक टालने की मांग की, जिसे कोर्ट ने सख्ती से खारिज कर दिया। न्यायालय ने मामले में नियमित (रोजाना) सुनवाई जारी रखने के निर्देश दिए।
दूसरी याचिका पर सुनवाई के दौरान लखनऊ निवासी याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि समरांग सूत्रधार में नगर नियोजन और मंदिर वास्तुकला का विस्तृत वर्णन मिलता है।
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि भोजशाला परिसर की संरचना, स्तंभों की बनावट और मूर्तिकला की शैली इस ग्रंथ में वर्णित सिद्धांतों से मेल खाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह स्थल मूल रूप से मंदिर था। उन्होंने 1304 ईस्वी के ग्रंथ ‘चिंतामणि’, 19वीं सदी के धार गजेटियर और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों का भी उल्लेख किया।
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खुदाई में प्राप्त ब्रह्माजी की एक दुर्लभ मूर्ति समरांग सूत्रधार में वर्णित स्वरूप से मेल खाती है। इसके अलावा हिंगलाजगढ़, मंदसौर और रायसेन से प्राप्त मूर्तियों की शिल्प परंपरा को भी उसी कालखंड से जुड़ा बताया गया।
हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि परमार कालीन निर्माण शैली और महाकालेश्वर मंदिर की वास्तुकला में भी समानताएं देखी जा सकती हैं।
मामले में अगली सुनवाई 15 अप्रैल को तय की गई है, जिसमें हिंदू पक्ष अपने तर्कों को और विस्तार से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा।