यह उस संवेदना की सजीव तस्वीर थी जो आज के समाज में दुर्लभ हो चुकी है। मंच पर जो संस्कार बोले जा रहे थे, वे शब्द बनकर गूंजे; लेकिन जो संस्कार मोहम्मद अमीन ने बोए, वे कर्म बनकर अमर हो गए
Local News of India
2025-11-10 20:46:30