नोएडा हो या दिल्ली, मौत का पता सिस्टम को पहले से होता है
नहीं।इस देश में अगर कोई मरे, तो सिस्टम को फर्क नहीं पड़ता।
क्योंकि सिस्टम जानता है—उसका कुछ बिगड़ने वाला
दिल्ली के जनकपुरी में एक युवक गड्ढे में गिरकर मर गया।
कातिल कोई अपराधी नहीं था, कोई दुश्मन नहीं था।
कातिल था वही सरकारी सिस्टम, जिसे हम हर महीने टैक्स देते हैं।
कुछ समय पहले नोएडा में इसी सिस्टम ने एक युवा इंजीनियर—युवराज—की जान ली थी।
अब दिल्ली में उसी लापरवाही ने कमल को मार डाला।
नाम बदले, शहर बदले, मौत का तरीका वही रहा—खुला गड्ढा, बंद जिम्मेदारी।
हादसा नहीं, यह प्रशासनिक हत्या है
इसे हादसा मत कहिए।
यह प्रशासनिक मर्डर है।
सरकारी फाइलों में हमारी जान की कीमत
एक चेतावनी बोर्ड, एक रिफ्लेक्टर,
या एक बैरिकेड से भी कम है।
अफसरों को भरोसा है जनता की कमजोर याददाश्त पर।
वे जानते हैं—
कुछ दिन टीवी पर बहस होगी,
अखबारों में हेडलाइन आएगी,
फिर सब शांत।
इसलिए वे निडर हैं।
इसलिए वे लापरवाह हैं।
क्योंकि उनके लिए मौत एक संख्या है
और जांच सिर्फ समय काटने का तरीका।
सबसे दुखद सच्चाई
सबसे दुखद यह नहीं कि लोग गड्ढों में गिरकर मर रहे हैं।
सबसे दुखद यह है कि
हमने इसे अपनी किस्मत मान लिया है।
यह किस्मत नहीं है।
यह हमारा सामूहिक पतन है।
हम चिल्लाते हैं।
फिर थक जाते हैं।
फिर चुप हो जाते हैं।
लेकिन याद रखिए—
आज युवराज और कमल की बारी थी।
कल वही गड्ढा
आपके या मेरे घर के किसी सदस्य का इंतजार कर रहा होगा।