लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
बर्नीहाट: देश में एथेनॉल को स्वच्छ ईंधन के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन इसकी उत्पादन प्रक्रिया के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। विभिन्न रिपोर्टों और विशेषज्ञों के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन में बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। फीडस्टॉक और उत्पादन प्रक्रिया के आधार पर प्रति गैलन एथेनॉल के लिए सैकड़ों से लेकर हजारों गैलन तक पानी की खपत हो सकती है, जिससे जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
मेघालय के बर्नीहाट क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों, जिनमें एथेनॉल उत्पादन से जुड़े उद्योग भी शामिल हैं, को लेकर स्थानीय लोगों ने वायु प्रदूषण, जल स्रोतों पर दबाव और पर्यावरणीय क्षरण की शिकायतें उठाई हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय दावों में कहा गया है कि कई इलाकों में स्वच्छ पेयजल की कमी के कारण लोगों को दूषित या मटमैले पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। हालांकि, इन परिस्थितियों के लिए किसी एक उद्योग या एथेनॉल संयंत्र को प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराने वाला निर्णायक वैज्ञानिक निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि उद्योगों में जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण के कड़े मानकों का पालन नहीं किया गया, तो हरित ईंधन का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के बजाय स्थानीय पारिस्थितिकी और समुदायों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। कुछ आलोचकों का कहना है कि इसका लाभ मुख्यतः उद्योगों तथा सत्ता से जुड़े लोगों को मिलता है, जबकि आम नागरिक प्रदूषण और संसाधनों की कमी का सामना करते हैं।