लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
बाड़मेर: राजस्थान के बाड़मेर जिले में सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के अभियान के दौरान गरीब भील आदिवासी परिवारों के कई कच्चे घरों को जेसीबी मशीनों से ढहा दिया गया। इस कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए। प्रभावित परिवारों का कहना है कि उनके जल, जंगल और जमीन पहले ही छीने जा चुके हैं और अब उनके घर भी उनसे छीन लिए गए हैं, जिससे वे अपने ही इलाके में बेघर होकर रह गए हैं।
कार्रवाई के दौरान कई महिलाओं और युवतियों ने अपने घर बचाने के लिए विरोध प्रदर्शन किया। कुछ महिलाएं टीन शेड और झोपड़ियों की छतों पर चढ़ गईं, जबकि कुछ ने अपने घर खाली करने से इनकार कर दिया। मौके पर पहुंची पुलिस ने विरोध कर रहे आदिवासियों को बलपूर्वक खींचकर हटाया और कई लोगों को जबरन बाहर निकाला। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए महिला पुलिसकर्मियों को भी बुलाया गया। विरोध के बीच प्रशासन ने कुछ पक्के निर्माणों पर कार्रवाई रोक दी, जबकि कच्चे मकानों को हटाया गया।
प्रभावित लोगों का कहना है कि यह सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों की जमीन, जंगल और रहने की जगह पर लगातार हो रहे कब्जे का हिस्सा है। उनका आरोप है कि जिन स्थानों पर वे पीढ़ियों से रहते आए हैं, वहां से उन्हें एक-एक कर बाहर किया जा रहा है। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी कहा है कि पहले जंगल और जमीन छीनी गई, और अब घरों को तोड़कर उन्हें उनके अपने स्थानों से बेदखल किया जा रहा है।
प्रभावित परिवारों और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि पुनर्वास की कोई व्यवस्था किए बिना लोगों के घर तोड़ना मानवीय दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। कई परिवारों का दावा है कि उन्हें वर्षों पहले बिचौलियों ने इस जमीन पर बसाया था और अब पूरा नुकसान उन्हें उठाना पड़ रहा है।
इस घटना ने अतिक्रमण हटाने की सरकारी कार्रवाई और गरीब आदिवासी समुदायों के पुनर्वास के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। फिलहाल प्रशासन की ओर से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की कोई तत्काल घोषणा नहीं की गई है।