लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) की रणनीति में बदलाव की तैयारी कर रहे हैं। एक हालिया सर्वे के अनुसार, पहली बार ऐसे केंद्रीय बैंकों की संख्या अधिक हो गई है जो आने वाले वर्षों में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी घटाने का इरादा रखते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, कई केंद्रीय बैंक अपने रिजर्व में सोने (Gold) की हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ-साथ अन्य मुद्राओं में भी निवेश बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। इसके पीछे भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और रिजर्व में विविधता (Diversification) लाने की रणनीति को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी डॉलर जल्द ही अपनी वैश्विक प्रमुख रिजर्व मुद्रा की स्थिति खो देगा। डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार, बैंकिंग और विदेशी मुद्रा भंडार में सबसे प्रभावशाली मुद्रा बना हुआ है, लेकिन उसकी हिस्सेदारी में धीरे-धीरे कमी आने की संभावना जताई जा रही है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि कई केंद्रीय बैंक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल रिजर्व प्रबंधन और डेटा विश्लेषण में बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, ताकि निवेश संबंधी फैसले अधिक प्रभावी ढंग से लिए जा सकें।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह रुझान जारी रहता है तो आने वाले वर्षों में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अधिक विविध हो सकती है। हालांकि फिलहाल अमेरिकी डॉलर की वैश्विक भूमिका मजबूत बनी हुई है और उसके विकल्प के रूप में कोई एकल मुद्रा पूरी तरह उभरती नहीं दिख रही है।