लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर चल रहे विवाद ने पंजाब के इतिहास और सिनेमा में दिखाई गई संवेदनशील कहानियों पर फिर बहस छेड़ दी है। फिल्म को रिलीज के कुछ समय बाद ही ZEE5 के भारतीय प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया, जिसके बाद राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
'सतलुज' को पहले 'पंजाब 95' नाम से जाना जाता था। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित बताई जाती है, जिन्होंने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर किया था।
इस विवाद के बीच 1996 में आई फिल्म 'माचिस' की भी चर्चा हो रही है। गुलजार के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने पंजाब में उग्रवाद और उस दौर के सामाजिक-राजनीतिक माहौल को कहानी के जरिए दिखाया था। फिल्म की रिलीज के समय भी इसके विषय को लेकर बहस हुई थी और इसे पंजाब की राजनीति पर असर डालने वाली फिल्मों में गिना गया।
'माचिस' के बाद अब 'सतलुज' को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं पर बनी फिल्मों का असर आज भी राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करता है। हालांकि दोनों फिल्मों की कहानियां और संदर्भ अलग हैं, लेकिन दोनों पंजाब के कठिन दौर को केंद्र में रखती हैं।
'सतलुज' को लेकर निर्माताओं और समर्थकों का कहना है कि फिल्म एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना को सामने लाती है, जबकि विरोध करने वाले पक्षों ने इसके विषय और प्रभाव को लेकर चिंताएं जताई हैं। फिल्म के OTT से हटने के बाद सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी बहस तेज हो गई है।