लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
जसवंत सिंह खालड़ा पर आधारित फिल्म 'सतलुज' एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। पहले 'पंजाब 1995' और उससे पहले 'घल्लूघारा' नाम से जानी जाने वाली इस फिल्म में खालड़ा के जीवन के अंतिम वर्षों, कथित फर्जी अंतिम संस्कारों की जांच और उनके अपहरण व हत्या की घटनाओं को प्रमुखता से दिखाया गया है।
खालड़ा ने 1984 से 1994 के बीच अमृतसर, पट्टी और तरनतारन के श्मशान घाटों के रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया था कि हजारों अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार किया गया, जिनमें कई कथित तौर पर पुलिस हिरासत में मारे गए लोग थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई जांच हुई, जिसमें 2,097 अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार की पुष्टि हुई और कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई।
विश्लेषकों का मानना है कि फिल्म खालड़ा के संघर्ष और मानवाधिकारों के मुद्दे को प्रभावी ढंग से सामने लाती है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इसमें 1980 और 1990 के दशक के पंजाब में उग्रवाद, आतंकवादी हिंसा, आम नागरिकों की पीड़ा और सुरक्षा बलों के सामने मौजूद चुनौतियों को पर्याप्त जगह नहीं दी गई है। इसी वजह से फिल्म पर "एकतरफा नैरेटिव" पेश करने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
फिल्म में 25 हजार लोगों के मारे जाने या लापता होने जैसे दावों को लेकर भी सवाल उठे हैं। आधिकारिक जांच में इतनी संख्या की पुष्टि नहीं हुई है, जबकि समर्थकों का कहना है कि राज्यभर में व्यापक जांच कभी हुई ही नहीं।
फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन और ओटीटी से हटाए जाने के बाद पंजाब में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। शिरोमणि अकाली दल, भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई गुरुद्वारों और सार्वजनिक स्थानों पर इसकी स्क्रीनिंग भी की जा रही है, जबकि कुछ पक्ष अदालत का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि 'सतलुज' अब केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास, मानवाधिकार, न्याय और उग्रवाद के दौर को लेकर चल रही बहस का अहम हिस्सा बन चुकी है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है।