लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
भारत में अफोर्डेबल हाउसिंग का बाजार तेजी से बढ़ा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये फ्लैट सच में इतने सस्ते होते हैं जितना दिखाया जाता है। रियल एस्टेट एक्सपर्ट्स का कहना है कि बिल्डर अक्सर “अफोर्डेबल” शब्द का इस्तेमाल खरीदारों को आकर्षित करने के लिए करते हैं, जबकि असली लागत बाद में सामने आती है।
कई प्रोजेक्ट्स में बेस प्राइस कम रखा जाता है, लेकिन क्लब फीस, पार्किंग, मेंटेनेंस, फ्लोर चार्ज, GST और रजिस्ट्रेशन जैसी अतिरिक्त लागतें जोड़ने के बाद फ्लैट की कीमत काफी बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट में सबसे बड़ा जोखिम लोकेशन और प्रोजेक्ट डिले का होता है। कम कीमत वाले कई प्रोजेक्ट शहर से दूर इलाकों में बनाए जाते हैं, जहां कनेक्टिविटी और बुनियादी सुविधाएं सीमित होती हैं।
रियल एस्टेट सेक्टर में यह भी देखा गया है कि कई बिल्डर कम मार्जिन के कारण प्रोजेक्ट की गुणवत्ता और समयसीमा पर असर डालते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, डेवलपर्स अब लक्जरी प्रोजेक्ट्स की तरफ ज्यादा झुक रहे हैं क्योंकि वहां मुनाफा ज्यादा मिलता है।
हालांकि, सरकार की PMAY जैसी योजनाओं और टैक्स बेनिफिट्स की वजह से पहली बार घर खरीदने वालों को कुछ राहत जरूर मिलती है। लेकिन एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि खरीदने से पहले RERA रजिस्ट्रेशन, बिल्डर का रिकॉर्ड, लोकेशन और छिपे हुए चार्ज जरूर जांचें।
जानकारों का मानना है कि सही रिसर्च और कानूनी जांच के बिना सिर्फ “सस्ता फ्लैट” देखकर निवेश करना भविष्य में नुकसान का कारण बन सकता है।