लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
Supreme Court of India ने समन जारी करने की प्रक्रिया को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि आरोपी को कानूनन जरूरी प्रक्रिया और उचित अवसर दिए बिना जारी किया गया समन “शून्य” माना जा सकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि निचली अदालतों और मजिस्ट्रेटों को समन जारी करते समय तय कानूनी प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक आदेश सिर्फ औपचारिकता नहीं हो सकते और आरोपी के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
फैसले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई से पहले उसकी स्थिति और कानूनी पहलुओं पर पर्याप्त विचार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया संबंधी गंभीर खामियों के साथ जारी समन अदालत में टिक नहीं सकते।
यह मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़ा था, जहां समन जारी करने की प्रक्रिया और आरोपी को सुनवाई का अवसर देने के मुद्दे पर सवाल उठे थे। अदालत ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक जांच और तथ्यों की पुष्टि करना आवश्यक होता है, खासकर जब आरोपी अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर रहता हो।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में आपराधिक मामलों में समन जारी करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बना सकता है। इससे निचली अदालतों में जल्दबाजी में जारी होने वाले समन पर भी असर पड़ सकता है।