गुरप्रीत कालरा
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में कार्यस्थल केवल काम की जगह नहीं, बल्कि विविध पहचान और संस्कृतियों का संगम भी होते हैं। ऐसे में देश की प्रमुख आईवियर कंपनी लेंसकार्ट का ड्रेस कोड विवाद राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। यह मामला केवल कॉरपोरेट नियमों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और कॉरपोरेट जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर गया।
विवाद तब शुरू हुआ जब सोशल मीडिया पर कंपनी के कथित ड्रेस कोड से जुड़ा एक दस्तावेज वायरल हुआ। इस दस्तावेज में कुछ धार्मिक प्रतीकों को अनुमति देने और कुछ पर प्रतिबंध जैसे संकेत दिखाई दिए। खासतौर पर यह आरोप लगा कि हिंदू धार्मिक प्रतीकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है, जबकि अन्य धर्मों से जुड़े प्रतीकों को अनुमति दी जा रही है। इसने लोगों में नाराजगी पैदा कर दी और मामला तेजी से सोशल मीडिया पर फैल गया।
विवाद बढ़ने पर कंपनी के सीईओ Peyush Bansal ने सफाई देते हुए कहा कि वायरल दस्तावेज पुराना है और वर्तमान नीति को नहीं दर्शाता। हालांकि, यह बयान लोगों के संदेह को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ स्तंभकारों ने इस दावे पर सवाल उठाए, जिससे विवाद और गहरा गया।
लगातार बढ़ते विरोध और जनदबाव के बाद कंपनी ने अपनी ड्रेस कोड नीति में बदलाव किया। नई स्टाइल गाइड जारी करते हुए लेंसकार्ट ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और कहा कि यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो उसे खेद है। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान उसकी प्राथमिकता है और कर्मचारियों को अपनी सांस्कृतिक पहचान छोड़ने की आवश्यकता नहीं है।
नई गाइडलाइन के अनुसार अब कर्मचारी बिंदी, तिलक, सिंदूर, कड़ा, मंगलसूत्र, कलावा, हिजाब और पगड़ी जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ कार्य कर सकते हैं। साथ ही पेशेवर वातावरण बनाए रखने के लिए कंपनी की टी-शर्ट, गहरे नीले रंग की साधारण जींस और बंद जूते पहनना अनिवार्य रखा गया है। छोटे आभूषण जैसे झुमके, नथ, अंगूठी और चेन भी स्वीकार्य हैं।
हालांकि, सोशल Media पर लोगों का गुस्सा पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। कई लोगों का कहना है कि यह बदलाव केवल दबाव में किया गया है, इसलिए इस पर पूरी तरह भरोसा करना मुश्किल है। कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि कंपनी वास्तव में भारतीय संस्कृति का सम्मान करती है, तो शुरुआत में ऐसी पाबंदियां क्यों लगाई गईं।
यह पूरा मामला धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार, कार्यस्थल समावेशिता और ब्रांड इमेज की संवेदनशीलता को सामने लाता है। यह भी स्पष्ट करता है कि सोशल मीडिया आज केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि जनजागृति और परिवर्तन का सशक्त मंच बन चुका है।
लेंसकार्ट का यह विवाद यह संदेश देता है कि कॉरपोरेट संस्थानों को केवल व्यावसायिक हितों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। वहीं समाज के लिए यह उदाहरण है कि जागरूकता और जिम्मेदार प्रतिक्रिया के माध्यम से सकारात्मक बदलाव संभव है।