लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
भारतीय पासपोर्ट को लेकर शुरू हुई बहस के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं माना गया है। सरकार ने कहा कि इस संबंध में कोई नया फैसला नहीं लिया गया है और यह कानूनी स्थिति लंबे समय से लागू है।
विवाद उस समय शुरू हुआ जब विदेश मंत्रालय (MEA) के एक अधिकारी ने पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर कहा कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाण पत्र। इस बयान के बाद विपक्षी नेताओं और कई सार्वजनिक हस्तियों ने सवाल उठाए कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो फिर कौन सा दस्तावेज नागरिकता साबित करता है।
सरकार ने सफाई देते हुए कहा कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के तहत विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी किए जा सकते हैं। इसी आधार पर यह कहा गया कि केवल पासपोर्ट का होना नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
केंद्र ने 2013 के बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र या आधार कार्ड जैसे दस्तावेज अकेले नागरिकता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। नागरिकता का निर्धारण संबंधित कानूनों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।
हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पासपोर्ट जारी करने से पहले सरकार आवेदक की नागरिकता की विस्तृत जांच करती है। पासपोर्ट अधिनियम की धाराएं यह भी स्पष्ट करती हैं कि यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है तो सामान्य परिस्थितियों में उसे पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता।
इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन सरकार का कहना है कि विदेश मंत्रालय ने केवल पहले से स्थापित कानूनी स्थिति को दोहराया है, किसी नई नीति की घोषणा नहीं की है।