लोकल न्यूज ऑफ इंडिया
अदिति जैन
लाल सागर और अरब सागर के बीच मौजूद बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। यह रास्ता यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के बीच तेल और दूसरे सामान की आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में अगर हूती विद्रोहियों का इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर नियंत्रण बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा।
भारत के लिए चिंता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि देश अपनी जरूरत के बड़े हिस्से का कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। लाल सागर और स्वेज नहर वाला समुद्री मार्ग बाधित होने पर तेल टैंकरों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है। इससे शिपिंग दूरी, बीमा और परिवहन लागत बढ़ सकती है और इसका दबाव कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
हूती विद्रोहियों और इजरायल के बीच जारी तनाव के बीच लाल सागर में पहले भी व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसके कारण कई शिपिंग कंपनियों ने अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते को प्राथमिकता दी, जिससे यात्रा में समय और लागत दोनों बढ़े।
भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल ऑयल सप्लाई की सुरक्षा और कीमत को लेकर है। अगर लंबे समय तक समुद्री मार्ग प्रभावित रहता है, तो भारत की रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की डिलीवरी महंगी हो सकती है। इसका अप्रत्यक्ष असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, माल ढुलाई और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बाब-अल-मंदेब में किसी भी व्यवधान से भारत की तेल सप्लाई तुरंत रुक जाएगी। भारत के पास अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदने और वैकल्पिक समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने की क्षमता है। लेकिन लंबे समय तक संकट रहने पर तेल की कीमत और लॉजिस्टिक्स लागत भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
यानी भारत से हजारों किलोमीटर दूर चल रहा यह संघर्ष समुद्र के रास्ते भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। अब नजर इस बात पर है कि बाब-अल-मंदेब में हूतियों का प्रभाव कितना बढ़ता है और वैश्विक शिपिंग कंपनियां इसका मुकाबला किस तरह करती हैं।