लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
Mina का मैदान हर साल हज के दौरान दुनिया भर के मुस्लिम श्रद्धालुओं से भर जाता है। यहीं पर “रमी अल-जमरात” नाम की वह रस्म होती है, जिसमें श्रद्धालु तीन बड़े स्तंभों या दीवारों पर कंकड़ फेंकते हैं। इसे प्रतीकात्मक रूप से “शैतान को सजा” देने की रस्म माना जाता है।
इस परंपरा का संबंध Eid al-Adha यानी बकरीद से भी गहराई से जुड़ा है। इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम (Abraham) की आस्था की परीक्षा ली थी और उनसे अपने बेटे की कुर्बानी देने को कहा था। रास्ते में शैतान ने कई बार उन्हें बहकाने की कोशिश की, लेकिन इब्राहिम ने हर बार उसे पत्थर मारकर ठुकरा दिया। उसी घटना की याद में हज यात्री मीना में शैतान का प्रतीक माने जाने वाले जमरात पर कंकड़ फेंकते हैं।
हज के दौरान 10वीं ज़िलहिज्जा को, जो बकरीद का दिन भी होता है, श्रद्धालु सबसे बड़े जमराह “जमरात अल-अक़बा” पर सात कंकड़ मारते हैं। इसके बाद अगले दो दिनों तक तीनों जमरात पर कंकड़ फेंके जाते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह रस्म सिर्फ शैतान को पत्थर मारने का प्रतीक नहीं, बल्कि इंसान के भीतर मौजूद बुराइयों, लालच और गलत इच्छाओं को त्यागने का संदेश भी देती है।
हर साल लाखों लोग इस रस्म में शामिल होते हैं, इसलिए सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन बड़ी चुनौती होती है। अतीत में यहां कई बड़े हादसे भी हो चुके हैं, जिसके बाद सऊदी अरब ने जमारात ब्रिज और पूरे मीना क्षेत्र में बड़े स्तर पर बदलाव किए।
बकरीद पर जानवर की कुर्बानी भी हजरत इब्राहिम की उसी आस्था और त्याग की याद में दी जाती है, जब उन्होंने अल्लाह के आदेश का पालन करने की तैयारी दिखाई थी।