लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
नई दिल्ली: यदि ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील मिलती है या उन्हें पूरी तरह हटा लिया जाता है, तो इसका सबसे बड़ा लाभ भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और तेल-गैस आयात पर बढ़ा दबाव कम हो सकता है।
पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अस्थिरता के कारण कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ीं। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इस स्थिति से सीधे प्रभावित हुआ।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक, चौथा सबसे बड़ा एलएनजी आयातक और दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक देश है। एक समय भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से पूरा करता था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद उसे इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देशों पर अधिक निर्भर होना पड़ा।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रतिबंध हटने की स्थिति में भारत को ईरानी तेल अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमतों पर मिल सकता है। इससे आयात लागत कम होगी और घरेलू ईंधन कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। साथ ही भारतीय रिफाइनरियों को कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाने का अवसर मिलेगा।
ईरान के साथ व्यापार सामान्य होने पर चाबहार बंदरगाह परियोजना को भी नई गति मिल सकती है। यह परियोजना भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती है। इसके अलावा उर्वरक, पेट्रोकेमिकल और परिवहन क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ने की संभावना है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अंतिम लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की शर्तें क्या होती हैं तथा वैश्विक ऊर्जा बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिर भी प्रतिबंधों में राहत भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिहाज से सकारात्मक कदम माना जा रहा है।